रचनायें

 

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देशभक्ति से ओतप्रोत उनकी रचनाओं की तभी से सर्वत्र प्रशंसा होने लगी थी।बहुत कम आयु में ही एक विद्यालय के प्राचार्य के रूप में अध्यापन के क्षेत्र में चले आये और सन् १९८३ई. में उनका पहला देशभक्ति से सराबोर काव्य संकलन "समर्पण" प्रकाशित हुआ।जिसके बाद से 'निशंक' ने पीछे मुडकर नहीं देखा और तमाम व्यस्तताओं के बाबजूद आज भी उनकी कृतियां अनवरत जारी हैं।

डॉ.'निशंक' जो विगत बीस वर्षों से राजनीति के क्षेत्र में एक सफल जननेता है,साहित्य के क्षेत्र में भी अपनी अस्मिता बनाये हुए है। डॉ.'निशंक'जो सार्वजनिक जीवन के बहिर्मुखी वातावरण में भी अन्तर्मुखी होकर राष्ट्र्भक्ति के पावन गीत गा रहे हैं।उन्हें मातृभूमि की महानता का जहां गर्व है,वहीं उस पर आती विपदाओं पर हार्दिक दु:ख और निराशा भी है।किन्तु वे आशावादी हैं और यही आशावादी सोच उनकी रचनाओं का प्राणवादीतत्व है।

पांच दशक से भी कम आयु के 'निशंक' कवि ने राजनीति के तुमुल रव में,सार्वजनिक कर्तव्यों का सफल निर्वाह करते हुये भी मां भारती की जो सेवा की है,वह उसके राजनैतिक अवदान से कहीं बड़ा है।तभी तो देश के तीन-तीन महामहिमों ने 'निशंक' को 'अशंक' होकर महिमामण्डित किया है।समय के साथ-साथ उनकी सारस्वत साधना निरन्तर प्रगाढ़तर होती जा रही है।

 

 

 
चित्रमाला